खबर की मुख्य बातें:
- शिपिंग कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग को देश में बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10,000 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन कार्यक्रम को मंजूरी दे दी है।
- इस पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य कंटेनरों के लिए चीन और अन्य विदेशी बाजारों पर भारत की निर्भरता को खत्म कर आत्मनिर्भर इकोसिस्टम तैयार करना है।
- सरकार की इस पहल से समुद्री व्यापार की लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और देश में हजारों नए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
देश के समुद्री व्यापार और निर्यात बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए सरकार ने शिपिंग कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग के लिए 10,000 करोड़ रुपये के विशेष कार्यक्रम को हरी झंडी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इस महत्वाकांक्षी योजना पर मुहर लगाई गई। इस फैसले का सीधा मकसद भारत को वैश्विक कंटेनर निर्माण का एक प्रमुख केंद्र बनाना और भारतीय निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई में आने वाली अड़चनों से राहत दिलाना है।
मिली जानकारी के मुताबिक, वर्तमान में भारत अपनी जरूरत के अधिकांश कार्गो कंटेनरों के लिए विदेशों, विशेषकर चीन पर निर्भर रहता है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव या सप्लाई चेन में रुकावट आने पर भारतीय निर्यातकों को कंटेनरों की भारी किल्लत और बढ़े हुए किराए का सामना करना पड़ता है। इसी चुनौती से स्थायी रूप से निपटने के लिए बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय ने घरेलू स्तर पर कंटेनर उत्पादन की क्षमता विकसित करने का यह खाका तैयार किया है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, आगामी पांच वर्षों में लागू होने वाली इस योजना के तहत देश में नई उत्पादन इकाइयां लगाने वाली कंपनियों को वित्तीय प्रोत्साहन और सब्सिडी दी जाएगी। सरकार का लक्ष्य है कि शिपिंग कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता हासिल कर भारतीय बंदरगाहों से होने वाले आयात-निर्यात को पूरी तरह सुरक्षित और किफायती बनाया जाए।
शिपिंग कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग योजना से घरेलू उद्योगों और स्टील सेक्टर को कैसे मिलेगा लाभ?
बता दें कि कंटेनर निर्माण में विशेष प्रकार के वेदर-रेजिस्टेंट स्टील (Corten Steel) का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। कैबिनेट के इस फैसले के बाद देश की प्रमुख स्टील कंपनियों, एमएसएमई (MSME) इकाइयों और भारी इंजीनियरिंग उद्योगों को बड़ा कारोबारी अवसर मिलेगा। गुजरात के भावनगर सहित देश के प्रमुख तटीय और औद्योगिक क्लस्टरों में कंटेनर निर्माण के बड़े हब विकसित किए जाने की योजना है।
गौरतलब है कि शिपिंग कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग को रफ्तार मिलने से न केवल मानक ड्राई कार्गो कंटेनर, बल्कि कृषि और फार्मा उत्पादों के निर्यात के लिए जरूरी रेफ्रिजरेटेड (Reefer) और विशेष श्रेणी के कंटेनरों का भी भारत में ही निर्माण हो सकेगा। इससे भारतीय एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को विदेशी शिपिंग लाइनों की मनमानी से बड़ी राहत मिलेगी।
केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के मायने: भारतीय निर्यात और लॉजिस्टिक्स लागत पर क्या होगा असर?
केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब भारतीय समुद्री लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि देश के भीतर पर्याप्त संख्या में कंटेनर उपलब्ध होने से निर्यातकों की लॉजिस्टिक्स लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी और भारतीय सामान अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।
इसके अलावा, हर साल विदेशी कंटेनरों की खरीद और लीजिंग पर खर्च होने वाली अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा की भी देश में बचत होगी। सरकार का अनुमान है कि शिपिंग कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े इस नए इकोसिस्टम के तैयार होने से वेल्डिंग, पेंटिंग, फैब्रिकेशन और पोर्ट लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में लाखों युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खुलेंगे।
पाठकों के प्रमुख सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: शिपिंग कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने कितने बजट को मंजूरी दी है?
उत्तर: केंद्रीय कैबिनेट ने देश में शिपिंग कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को विकसित करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है।
प्रश्न 2: भारत में ही शिपिंग कंटेनर बनने से देश के निर्यातकों को क्या सबसे बड़ा फायदा होगा?
उत्तर: देश में कंटेनर बनने से चीन जैसे देशों पर आयात निर्भरता खत्म होगी, माल ढुलाई (लॉजिस्टिक्स) का खर्च घटेगा और वैश्विक संकट के समय भारतीय निर्यातकों को कंटेनरों की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
स्रोत: केंद्रीय कैबिनेट के आधिकारिक निर्णय एवं बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के इनपुट्स के आधार पर (BhaaratFeed न्यूज़ डेस्क)