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राजेश खन्ना और अनीता आडवाणी के रिश्ते को शादी मानने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

खबर की मुख्य बातें:

  • राजेश खन्ना और अनीता आडवाणी के रिश्ते को वैध विवाह की तरह मान्यता देने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।
  • शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि दिवंगत अभिनेता के साथ लिव-इन में रहने के बावजूद अनीता आडवाणी को कानूनी पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
  • कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद अब राजेश खन्ना के परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज घरेलू हिंसा का मामला आगे नहीं चल सकेगा।

राजेश खन्ना और अनीता आडवाणी के रिश्ते को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद पर अब देश की सर्वोच्च अदालत ने अंतिम विराम लगा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अनीता आडवाणी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने दिवंगत बॉलीवुड सुपरस्टार के साथ अपने लिव-इन रिलेशनशिप को शादी की प्रकृति का मानते हुए घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत की मांग की थी। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि जब आवेदक खुद यह स्वीकार कर रही हैं कि अभिनेता पहले से शादीशुदा थे, तो इस रिश्ते को विवाह के समान नहीं माना जा सकता।

मिली जानकारी के मुताबिक, साल 2012 में राजेश खन्ना के निधन के बाद अनीता आडवाणी ने दावा किया था कि वह अभिनेता के अंतिम वर्षों में उनके बंगले ‘आशीर्वाद’ में एक पत्नी की तरह उनके साथ रह रही थीं और उनकी देखभाल कर रही थीं। इसी आधार पर उन्होंने मुंबई की मजिस्ट्रेट कोर्ट में दिवंगत अभिनेता की पत्नी डिंपल कपाड़िया, बेटी ट्विंकल खन्ना, रिंकी खन्ना और दामाद अक्षय कुमार के खिलाफ घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (DV Act) के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। आडवाणी का आरोप था कि अभिनेता की मृत्यु के बाद उन्हें बंगले से जबरन बाहर निकाल दिया गया और संपत्ति व भरण-पोषण से वंचित रखा गया।

आधिकारिक कानूनी रिकॉर्ड के अनुसार, इससे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने खन्ना परिवार को बड़ी राहत देते हुए अनीता आडवाणी की शिकायत को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट के उसी फैसले को चुनौती देते हुए आडवाणी ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां से भी राजेश खन्ना और अनीता आडवाणी के इस चर्चित मामले में उन्हें कोई कानूनी राहत नहीं मिली।

राजेश खन्ना और अनीता आडवाणी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्यों ठुकराई याचिका?

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान घरेलू हिंसा कानून की धारा 2(f) के तहत ‘विवाह की प्रकृति के संबंध’ (Relationship in the nature of marriage) की कानूनी परिभाषा को स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि किसी भी लिव-इन रिलेशनशिप को शादी के समकक्ष तभी माना जा सकता है, जब दोनों पक्ष कानूनी रूप से विवाह करने की योग्यता रखते हों और उनमें से कोई भी पहले से शादीशुदा न हो।

गौरतलब है कि राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया भले ही कई वर्षों से अलग रह रहे थे, लेकिन उनके बीच कभी कानूनी तलाक नहीं हुआ था। ऐसे में पहली वैध शादी के अस्तित्व में रहते हुए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन में रहने को कानून की नजर में ‘वैवाहिक संबंध’ का दर्जा नहीं मिल सकता। इसी ठोस कानूनी आधार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला डिंपल कपाड़िया और उनके परिवार के पक्ष में गया।

लिव-इन रिलेशनशिप और घरेलू हिंसा कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या कहता है?

लिव-इन रिलेशनशिप और पारिवारिक संपत्ति के विवादों के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक बेहद अहम नजीर माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत भरण-पोषण या निवास का अधिकार केवल उन्हीं लिव-इन पार्टनर्स को मिल सकता है, जिनका रिश्ता समाज के सामने पति-पत्नी जैसा रहा हो और दोनों पक्ष अविवाहित, तलाकशुदा या विधुर/विधवा रहे हों।

यदि कोई महिला या पुरुष यह जानते हुए किसी ऐसे व्यक्ति के साथ संबंध में रहता है जो पहले से विवाहित है, तो वह घरेलू हिंसा कानून के तहत वैध पत्नी या साझेदार वाले अधिकारों का दावा नहीं कर सकता। इस फैसले के साथ ही एक दशक से अधिक समय से चल रहे राजेश खन्ना और अनीता आडवाणी के कानूनी विवाद का पटाक्षेप हो गया है और खन्ना परिवार को सभी कानूनी कार्यवाहियों से मुक्ति मिल गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्रश्न 1: राजेश खन्ना और अनीता आडवाणी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या मुख्य फैसला सुनाया है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने राजेश खन्ना और अनीता आडवाणी के लिव-इन रिलेशनशिप को शादी की प्रकृति का संबंध मानने से इनकार कर दिया है और खन्ना परिवार के खिलाफ दर्ज घरेलू हिंसा की याचिका खारिज कर दी है।

प्रश्न 2: अदालत ने अनीता आडवाणी के रिश्ते को विवाह के समान क्यों नहीं माना?
उत्तर: चूंकि राजेश खन्ना का अपनी पत्नी डिंपल कपाड़िया से कानूनी तलाक नहीं हुआ था, इसलिए पहली वैध शादी के रहते हुए किसी अन्य लिव-इन रिश्ते को कानूनन विवाह के समकक्ष मान्यता नहीं दी जा सकती।

स्रोत: सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही एवं प्रमुख विधिक मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर (BhaaratFeed न्यूज़ डेस्क)

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